शनिवार, 19 नवंबर 2016

सरेह में

हुआँ हुआँ मची है सरेह में,
कोई फसल कटी है सरेह में।

खुश किसान सभी खलिहान खुश,
सियारों की लगी है सरेह में।

फँसे मीन घिरा पानी खूब,    
नई मेंड़ें बँधी हैं सरेह में।

ताले लटक गये गोदाम में,
अब चाभियाँ लगी हैं सरेह में।

घन घमण्ड बड़े बरजोर घिरे,  
जो अर्थियाँ सजी हैं सरेह में।

सय्याद ले भागा अजाब सब,
पकड़ो पकड़ो मची है सरेह में। 

नहीं गोपी कोई गेह में,  
इक बाँसुरी बजी है सरेह में।

सोमवार, 7 नवंबर 2016

माँ अमर नहीं करती

माँ अमर नहीं करती
जन्म दे बड़ा कर देती है।

पहली बार जिस दिन
माँगता है क्षमा पिता
संतति से किसी भूल की
टपकता है उसकी आँख से
अमृत
और बढ़ जाती है
आयु
कुछ सदियाँ और
मनुज की भूमि पर।

करते हैं पिता अमर
होते हैं कई गुना बड़े
उनके सम्वत्सर।

वे भूल करते हैं,
माँ कभी नहीं करती। 

प्रेम करोगी?

प्रेम अंततः टूटना है आँजुरी भर पाँखुरी, भींचना है, कि रोयें, टूटे पुहुप, सुबुक और जग सुगंधित हो। कहो! प्रेम करोगी? (होना, प्रेम नहीं, बस आपा खोना है)

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

अकेली जरा का पर्व

नीम झरे दुअरा पर सूखी, चौकी पर है धूर।
शमी गाछ की छाँह कँटीली, स्वामी घर से दूर॥
सोने के पिजड़े में सुगना, ना दाना ना ठोर।
रामनाम की टेर लगी है, जाना है उस छोर॥
गइया सब को कौरा पहुँचे, चिरई सब को नीर।
मनपूओं की बात अधूरी, ज्यों स्मृतियों की खीर॥
सूगर फ्री में बनी तस्मई, देवकुर पाकड़ घाट।
गदबेरा अबीर में सुत की, मइया जोहे बाट॥
सन्नाटा है घर के आँगन, सिमटा सकल वितान।
भीगी आँखों बुढ़िया देखे, बासी सब पकवान॥

बुधवार, 7 सितंबर 2016

नयन माँ के

नयन माँ के
हर पल थामे
भीत,
लिखा जिस पर
पिता का जाना -
अदृश्य मसि।

अंधेरे से भी
झाँकती है
हार,
पीर
दो थके नयनों की।

सपाट मुख
स्थायी भाव
विवर्ण हम
सो नहीं पाते
रो नहीं पाते।

प्रात: दिलासा देती है माँ
जाने दो, ठीक ही हुआ
मत सोचो..

और मुझे पता चलता है
अमा की रात
ओस झुलसी आग
कैसे शीतल होती है।

ताकने लगता हूँ आकाश
कि
उमड़े जो, थमे रहें
छिप जांय...
... माँ जाने कौन सा नया बोझ
नई हार
और पिरो लेगी आँखों में
बहें तो बहें
बस दिखें न।