सोमवार, 21 जुलाई 2014

गधे पर रकाब

हम जिसे ख्वाब कहते हैं
वो उसे खराब कहते हैं

छुपा है रूप नूर के पीछे
आँखों से हिजाब दिखते हैं

इश्क़ उनकी लिखाई में 
हर्फ हर्फ शबाब दिखते हैं

कीमती बहुत मायूसियाँ
नफरतें बेहिसाब रखते हैं

तैयारी है अश्वमेध की
गधे पर रकाब कसते हैं

~ गिरिजेश राव 

शनिवार, 19 जुलाई 2014

आत्मज्ञान

... और अंत में मैंने अपनी वह रचना पढ़ी जिसे
मानसिक निर्वात में रचा था।
निर्वात वैसा नहीं जिसमें कुछ नहीं होता
निर्वात ऐसा जिसमें केवल वही थी
और

मैंने जाना कि तमाम दर्शन
ढेरों धर्मग्रंथ, प्रवचन,, साहित्य, गढ़ू ग्रंथ, विचार, विमर्श आदि आदि
सुन्दर ध्वंसावशेष थे जिन्हें संग्रहालयों में सजा
 या
घर की दीवारों पर टाँग
इम्प्रेशन जमाया जा सकता था
आदर भी दिया जा सकता था
सहेजा जा सकता था कि
प्रमाण हो आगामी पीढ़ियों के पास
कि पुरनिये निपट गँवार अन्धविश्वासी न हो
बहती नदी से बाहर को उछाल मारती मछलियों से थे
और   
'चिंतनीय' थे
कि चिंतनीय होना जीवन का चिह्न होता है
इसलिये वे जीवन से लबालब भरे आदरणीय थे आदि आदि।

बात वही कि सोता भीतर से ही फूटता है
वही श्रेय है
हाथों में छेनी हथौड़ी और मन में चट्टान तो हो!

उस प्राचीन रोमन कुल्हाड़ी को सहेज क्या हासिल
जिसकी बेंट सात बार

और जिसका फल चार बार बदले जा चुके हों?

शनिवार, 31 मई 2014

विविधा

(1)
स्थगित किया चूमना हमने
टूटने तक खिंच चुकी धड़कन
न झेल पाती नम दहकन!

(2)
हवन परोपकार के
तुम कुंड मैं समिधा
दहन अगन जलन धूम संसार के।

(3)
उपमा
रूपक नहीं आते मुझे
न जानता हूँ चाँद तारों की ऊँचाइयों को

बस तुम्हारी चाय के साथ पारले जी होना चाहता हूँ।  

(4)
आँसू काजल से लिखी पाती
प्रतिशोध वश राख हुई
पत्थर पर रह गया तुम्हारा नाम भीगा।


(5)
पहले ग्रीटिंग कार्ड में सूखी पंखुड़ियाँ
टूट कर बिखर गईं रसोई में
तुमने सराहा मेरा जूड़े में लगाना घेंवड़े का फूल।   

______________
~गिरिजेश राव~

मंगलवार, 20 मई 2014

वासना याचना

प्रशांत मुख उभरे
लाल होठ
साँझ शांत सर
निमलित रक्तपुंडरीक 
कर लूँ आचमन
निशापूजन हेतु?


गुरुवार, 1 मई 2014

अधिकार

बनाये नहीं जाते
दिये नहीं जाते
लिये नहीं जाते
कुछ अधिकार

बस होते हैं
होते हैं कि
उनके होने से
सब होते हैं
बनाने वाले
देने वाले
लेने वाले

वे ऐसे जुड़ते हैं
क्षिति - भोजन
जल - प्यास
पावक - पेट
गगन -  एकांत
समीर - साँस

करते व्यापार
छीनना चाहते हो
वे अधिकार

कैसे छीनोगे उन्हें?
जो
बनाये नहीं गये
दिये नहीं गये
लिये नहीं गये

वे थे, हैं, रहेंगे
कि तुम्हारा होना भी
उनसे ही है
खुद को खुद से
छीन कर तो देखो
मिटा कर तो देखो

दबंगई गिरहकटी
कुछ मामलों में नहीं चलते
जैसे:
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर
भोजन, प्यास, पेट, एकांत, साँस