रविवार, 23 फ़रवरी 2014

फूट पड़ो



अपनी बातों से
कुरेदता हूँ
कि तुम उठो!
नहीं,
फूट पड़ो
भँड़सार की जलती रेत से
उछलते मकई के दाने की तरह!
मुझे तुम्हें शुभ्र तप्त होते देखना है
जैसे कि पीताभ
मार्तण्ड होता है।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

टँगी

टँगी है ठिठुरन
वसंत में भीगती
पत्ती के सूखे गात से - 
उतार लूँ 
ओढ़ सकूँ 
तो कविता बने!  

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

जागरण

प्रार्थना के अर्घ्य सम
अलस मंत्र गीति लय
निशा जागरण आँजुरी भर
पीना चाहता हूँ।

प्रात नव स्निग्ध नम
रक्तिम नींद अधर पर
ले चुम्बन एक पलक भर
सोना चाहता हूँ।

न कहना -
जागना चाहता हूँ!

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गिरिजेश राव 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

और वे मंत्र हो गये!

समझता हूँ स्पर्श तुम्हारे नयनों के 
लालिमा फूटती भी है गह्वर में 
उलझा निज विधा सायास 
रोकता हूँ रुख तक आने से 
आ गयी जो 
नयन वही होंगे तुम्हारे 
किंतु स्पर्श खो जायेंगे 
तुम्हारा यूँ निहारना मुझे 
रुचता है, मोहता है 
मैं खोना नहीं चाहता 
रोकता हूँ लालिमा निज की इसलिये।
जाने कितने क्षण अक्षण हुये 
ऐसे में कुछ किया नहीं मैंने 
बस अपने गीतों को 
तुम्हारा नाम दिया 
और वे मंत्र हो गये!
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~ गिरिजेश राव 

शनिवार, 23 नवंबर 2013

हुई लाल!



साँझ को 
निशा निमंत्रण 


सूरज ने फेरा हाथ 
गोरी गंगा लाज 

हुई लाल!