रविवार, 17 मार्च 2013

वनदेवी

ऋग्वेद का उषा सूक्त विश्वप्रसिद्ध है लेकिन इस तथ्य को बहुत कम रेखांकित किया गया है कि वनदेवी अरण्यानी के लिये भी उतनी ही सुन्दर ऋचायें गायी गयी हैं। दसवें मंडल के 146 वें सूक्त की 6 ऋचाओं की कविता अद्भुत है और वाल्मीकि के ऋतुवर्णनों सा सौन्दर्य लिये हुये है। मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ:
 
वन वन भटकती ओझल होती हे वनदेवी!
क्यों न तुम भय खाती न पूछती गाँव का पता!
उत्तर देता टिड्डा जब झिंगुर झंकार की उठान का 
उल्लसित होती है वनदेवी घंटियों के स्वर सी हिलमिल।
और सामने पशु जो दिखते चरते से निज परिवेश
स्यात साँझ को वनदेवी ने खोल दिये छकड़े के बन्ध!
गिरा दिया वृक्ष किसी ने हाँक पार रहा कोई गैया
उतरी साँझ में वनबटोही समझ रहा चीख किसी की!
वनदेवी कभी न हनती जब तक न आये अरि हत्यातुर
खा कर सुगन्धित इच्छित फल जन लेते विश्राम ठहर।
मैंने कर ली स्तुति अब अंजनगन्ध सुरभित वनदेवी की
माता है जो मृगकुल की कृषि से दूर पर भोजन भरपूर।
 
 
aranyani

12 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे ही पढ़ते रहें और लिखते रहें थोड़ा -थोड़ा हमें भी पढ़ने को मिल जाता है ... आभार इस भावानुवाद के लिए ....

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  2. .
    .
    .
    बेहतर भावानुवाद,

    आभार, कविश्रेष्ठ...


    ...

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  3. बहुत सार्थक भावानुवाद,धन्यबाद.

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  4. यह बहुत ग़ज़ब है। उषा की ऋचाओं को पढ़ने-फिर हिन्दी में लिखने की अपूर्ण इच्छा कब पूरी होगी,कह नहीं सकता। सो पूरी ऋचायें ही आयें न क्रमशः।
    आभार।

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