शुक्रवार, 22 मई 2009

मुझसे पहली सी मुहब्ब्त. . अंतिम भाग

नज्म बहुत सरल सी दिखती है, प्रेमी प्रेमिका से कह रहा है कि तुम अभी भी सुन्दर हो लेकिन जमाने में इतने दु:ख दर्द हैं कि मैं अब तुम्हारी आँखों में बस डूब कर ही नहीं रह सकता, मुझे तो तमाम जुल्मों सितम भी दिखते हैं और तुमसे मिलन के बजाय जुल्मों सितम को कम करना मुझे अधिक आकर्षित करता है.

यह नज्म जब लिखी गई थी तो समाजवाद और कम्यूनिस्ट आन्दोलन का जोर था और उस ज़माने के हर सेंसिबल युवा की तरह फैज़ को भी इस विचारधारा ने बहुत प्रभावित किया.

लेकिन! लेकिन !!
फैज के अन्दर इस पुराने देश के संस्कार भी रक्त बन कर बह रहे थे और जुल्मो सितम को देखने, बूझने और भोगने से उत्पन्न दु:ख ने अलग ही रास्ता लिया. यहीं यह नज्म कइ स्तरों वाली हो जाती है. जन के दु:ख से दु:खी अभिव्यक्ति समाजवादी सोच जैसी दिखते हुए भी सूफी दर्शन, द्वैत और विशिष्टाद्वैत की सीढ़ियाँ चढ़ती बौद्ध दर्शन की करुणा में समाहित हो जाती है.

किसी ने कहा है कि श्रेष्ठ रचना रचयिता के कलम से निकलते ही उसकी न होकर सबकी हो जाती है. फिर उस पर रचयिता का कोई बस नहीं रह जाता और उसके विभिन्न अर्थ स्वयं रचयिता को भी स्तब्ध कर देते हैं.... ऐसा तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था !

'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?'
बहुत सी कविताओं और फिल्मी गीतों में बदले रूपों में आ आ कर यह अभिव्यक्ति आज कुछ पुरानी सी लगती है लेकिन कल्पना कीजिए जब यह लाइन पहली बार आई होगी. प्रेम की गहनता को व्यक्त करती इससे अच्छी लाइन हो ही नहीं सकती !

सूफी मार्ग में ईश्वर को प्रेमिका रूप में भी देखा जाता है.
सब कुछ भूल कर दीवानगी की उस हद तक पहुँच जाना कि बस मासूक की आँखों के सिवा कुछ न दिखे और दुनिया की सारी बहारें ठहर सी जाँए...जरा सोचिए फैज़ एक आम लड़के और लड़की के प्यार को भी किस तरह से ट्रीट करते हैं !! और उसके बाद का आघात जहाँ सारे जहाँ का दर्द अपना हो जाता है... जैसे कि वह मासूक जन जन में समा जाय. वह दर्द, वह यातना, वे षड़्यंत्र, वे दर दर बिकते जिस्म, शोषण, वह तिल तिल गलन...फैज़ सब भोगते हैं. .और उमड़ता है दु:ख , घनघोर सर्व समाहित करता दु:ख..

दु:ख शब्द में जो सान्द्रता है वह 'ग़म' में नहीं.
फैज़ जुल्मो सितम और उसकी पीड़ा की सान्द्रता को दर्शाने के लिए दु:ख शब्द का प्रयोग करते हैं और कविता बुद्धत्त्व की गरिमा से उद्भाषित हो जाती है.. सर्वं दुक्खम. ..
ज्ञान के बाद ही तो मुक्ति है.
अब मुझसे पहली सी मुहब्बत मत माँगो..

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